‘IIM टॉपर सब्ज़ीवाला’ : सामुदायिक खेती के ज़रिए बदल रहा है 35, 000 किसानों की ज़िंदगी!

Press ReleaseJuly 6, 20190 Commentsadmin

 

कभी एक छोटे-से कमरे से अपना बिज़नेस शुरू करने वाले कौशलेंद्र आज पूरे बिहार के किसानों और उनके परिवारों से जुड़े हुए हैं। उनका उद्देश्य बिहार में किसानों के सामुदायिक संगठन बनाना है, ताकि सभी किसान एक-दूसरे से जुड़कर, एक-दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ें।बिहार के नालंदा जिले में स्थित मुहम्मदपुर गाँव के रहने वाले कौशलेंद्र ने अपनी स्कूल की पढ़ाई जवाहर नवोदय स्कूल से की।बारहवीं कक्षा के बाद उन्होंने गुजरात के जूनागढ़ के इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने इज़रायल की एक कंपनी के लिए आंध्र प्रदेश में ड्रिप-इरिगेशन सिस्टम पर काम किया। एक साल जॉब करने के बाद वे फिर एक बार गुजरात पहुँचे और उन्होंने CAT के एग्जाम की तैयारी शुरू कर दी।उन्होंने एग्जाम पास किया और उन्हें IIM अहमदाबाद में दाखिला मिल गया। एमबीए की पढ़ाई के दौरान उन्होंने हमेशा टॉप किया और गोल्ड मेडलिस्ट रहे। वे चाहते तो देश की बड़ी से बड़ी फर्म में उन्हें नौकरी मिल जाती। पर उनका लक्ष्य एकदम साफ़ था। उन्हें अपना कुछ काम शुरू करना था, वह भी कोई ऐसा स्टार्ट-अप जिसके ज़रिये बिहार के किसानों के लिए काम किया जा सके।

2008 में उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर दो संगठन शुरू किए। एक ‘कौशल्या फाउंडेशन’ जो पूरी तरह से नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन है और जिसका उद्देश्य किसानों के हितों का संरक्षण है। वहीं, उन्होंने एक कमर्शियल कंपनी Knids Green Private Limited (KGPL) भी शुरू की। फाउंडेशन का मुख्य कार्यालय पटना में है, जबकि कई फील्ड ऑफिस नवादा, मुजफ्फरपुर, चंपारण जैसे जिलों में भी हैं।

कौशलेंद्र बताते हैं कि जब उन्होंने किसानों से मिलना शुरू किया और उन्हें अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल करके खेती करने के सुझाव दिए, तो बहुत कम लोगों ने उनकी बातों पर ध्यान दिया। महीनों की दिन-रात की मेहनत के बाद वे किसानों में भरोसा पैदा कर पाए और अब आलम यह है कि उन्हें ख़ुद किसी गाँव या कस्बे में जाना नहीं पड़ता, बल्कि वे उसी जगह काम करते हैं, जहाँ के लोग आगे बढ़कर उनसे मदद मांगते हैं। कौशलेंद्र जिस भी गाँव में वे किसानों की ट्रेनिंग के लिए वर्कशॉप कराते हैं, वहाँ उनकी कोशिश रहती है कि वे किसानों के समूह बनाएं। इससे किसान जो भी सीखते हैं, वह दूसरे किसानों को सिखाते हैं और इस तरह से एक चेन बनती है।

आज कौशलेंद्र के इन कामों से लगभग 35, 000 किसान परिवारों को फायदा मिल रहा है। उनकी कोशिश है कि हर किसान की मासिक आय कम से कम इतनी हो कि वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज सके। ख़ुशी की बात यह है कि अब उनकी कोशिशें रंग ला रही हैं।

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